नई दिल्ली : मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने बृहस्पतिवार को कहा कि राजधानी में वृद्धों के लिए 50 नए मनोरंजन केंद्रों की स्थापना की जाएगी। साथ ही मनोरंजन केंद्र की संचालन राशि को 15 हजार से बढ़ाकर 20 हजार रुपये किया जाएगा। शाली दीक्षित वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के लिए गठित राज्य परिषद की तीसरी बैठक को संबोधित कर रही थीं।मुख्यमंत्री ने कहा कि राजधानी में ऐसे सैकड़ों वृद्ध दंपति एकाकी जीवन जी रहे हैं। जीवन के इस पड़ाव पर उनके बच्चों ने उन्हें अकेला छोड़ दिया है। कुछ वृद्ध की उम्र अधिक होने के कारण उनकी हालत बदतर हो गई है। दिल्ली सरकार पहले से ही करीब 50 मनोरंजन केंद्रों को दिल्ली के विभिन्न क्षेत्रों में सफलतापूर्वक चला रही है। आगामी वर्षो में 50 और नए मनोरंजन केंद्रों की स्थापना करने की मंजूरी दी जा चुकी है। उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली में रह रहे सभी वरिष्ठ नागरिकों को पहचान-पत्र जारी किए जाएंगे ताकि उन्हे सरकारी संस्थानों, स्टेशनों, अस्पतालों आदि में बेहतर सुविधा मिल सके। बैठक में समाज कल्याण विभाग की सचिव देवाश्री ने उनको बताया कि सामाजिक सुविधा संगम के माध्यम से गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले वृद्धों की पहचान की जा रही है। इसलिए फिलहाल समाज कल्याण विभाग वृद्धों को वरिष्ठ नागरिक पहचान-पत्र जारी नहीं कर रहा है। बैठक में मौजूद परिषद के सदस्यों ने मांग की कि वृद्धों को वरिष्ठ नागरिक पहचान-पत्र जारी करने का कार्य नहीं रुकना चाहिए। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि दिल्ली में रह रहे सभी वृद्धों को वरिष्ठ नागरिक पहचान पत्र जारी करने के कार्य को नहीं रुकना चाहिए।बैठक में वरिष्ठ नागरिकों के लिए गठित राज्य परिषद की एक वर्ष की कार्य योजना को मंजूरी भी दी गई। वरिष्ठ नागरिकों के लिए चलाए जा रहे मनोरंजन केंद्रों व ओल्ड ऐज होम्स की स्थिति की भी समीक्षा की गई। बैठक में दिल्ली पुलिस के अतिरिक्त आयुक्त केवल सिंह ने बताया कि हर बीट कांस्टेबल अपने क्षेत्र में अकेले रह रहे बुजुर्ग दंपति की देखरेख करते हैं ताकि वे वारदात के शिकार न हों। पुलिस के पास रजिस्ट्रेशन कराने वाले बुजुर्गो के साथ वारदात की शिकायत नहीं मिली है।
Friday, June 5, 2009
Thursday, June 4, 2009
देवरे पर ले जाकर पत्नी की निर्मम हत्या
थानाधिकारी सुमेर सिंह मय जाब्ता अभियुक्त के साथ घटनास्थल पहुंचे जहां मांगी बाई की क्षत विक्षत लाश पड़ी थी। थानाधिकारी सुमेरसिंह ने तुरंत घटना की सूचना उच्चाधिकारियों को दी। जिस पर डिप्टी (पश्चिम) गोपालंिसंह राठौड़ भी घटनास्थल पहुंचे तथा मौका मुआयना किया। पुलिस ने लाश को मुर्दाघर रखवाया। सूचना पर मृतका के ननिहाल पक्ष के लोग भी मुर्दाघर पहुंच गये थे। पुलिस ने मेडिकल बोर्ड से मृतका का पोस्टमार्टम करा लाश परिजनों को सुपुर्द की।
चरित्र सन्देह पर की हत्या
उदयपुर। पुलिस पूछताछ में अभियुक्त सुरेश कुमार ने चरित्र सन्देह को लेकर पत्नी की हत्या करने की बात कहीं। इधर मृतका के ममेरे भाई पन्नालाल निवासी ब्रह्मपोल ने चरित्र सन्देह की बात को नकारते हुये कहा कि अभियुक्त सुरेेश उसकी बहन के साथ आये दिन मारपीट करता व दहेज प्रताडऩा देता था। वह उसे घर से भी कहीं जाने नहीं देता था। इसकी शिकायत मांगी बाई कई बार पीहर पक्ष से भी कर चुकी थी। मृतका क े२ पुत्री व छ:माह का पुत्र हैं।
एक बार असफल रहा : पुलिस पूछताछ में अभियुक्त सुरेश ने बताया कि एक दो दिन पूर्व भी वह हत्या के इरादे से पत्नी को नारियल चढ़ाने का झांसा देकर भुवाणा में ही एक अन्य देवरे पर ले गया था। लेकिन वहां विद्युतकर्मियों क ेकार्य करने की वजह से वह वारदात को अंजाम नहीं दे पाया । सुखेर हाईवे रोड पर देवरा उसे उपयुक्त स्थान लगा। द्वारिका अग्रवाल
फाँसी का कठोर दंड
इसके बाद प्रमाणित होने पर छोटी-मोटी सजा भुगत लेते हैं। इससे विभिन्न वर्गों में भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति बढ़ रही है। इसी तरह दहेज हत्या के मामलों में भी क्रूर अत्याचारी जमानत लेकर खुलेआम घूमते हैं और कभी-कभी तो पुनः नया शिकार खोज लेते हैं। एक मोटे गैर सरकारी अनुमान के अनुसार भारत में हर चार घंटे में दहेज हत्या की एक घटना प्रकाश में आने लगी है। न्यायमूर्ति काटजू ने हरियाणा में एक पति और उसके परिवार के सदस्यों द्वारा महिला को जलाकर मार दिए जाने संबंधी गंभीर प्रकरण में आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी।
न्यायमूर्ति ने कहा कि 'ऐसे लोग किसी रियायत के काबिल नहीं हैं। पत्नी को जलाकर मार देने वाले पतियों को फाँसी पर लटका देना चाहिए।' दहेज हत्या के मामले में कड़ी सजा के प्रस्तावों पर पिछले कुछ वर्षों से विचार-विमर्श चल रहा है। दो वर्ष पहले राष्ट्रीय विधि आयोग ने दहेज हत्या के मामलों में सजा के वर्तमान कानूनी प्रावधानों में संशोधन की सिफारिश की थी। इस समय सात साल की सजा का प्रावधान है। विधि आयोग ने दंड की अवधि दस साल करने की सिफारिश की थी। साथ ही यह भी कहा था कि बहुत ही असामान्य-अमानवीय मामलों में ही मृत्युदंड दिया जाना चाहिए। लेकिन अब तक कानूनों में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है। मानव अधिकारों की रक्षा के लिए अभियान चलाने वाले तो हत्यारों और आतंकवादियों तक को फाँसी दिए जाने का विरोध करते हैं। नतीजा यह है कि दहेज हत्या या पति तथा परिजनों द्वारा सताए जाने पर महिलाओं की आत्महत्या की घटनाओं में निरंतर वृद्धि हो रही है। वास्तव में ये आत्महत्याएँ भी हत्या के रूप में ही मानी जानी चाहिए। लगभग 15 हजार दहेज हत्या के मामले हर साल सामने आ रहे हैं। ऐसी स्थिति में न्यायालय से कठोरतम दंड, कानूनों में भी आवश्यक फेरबदल तथा सामाजिक जागरूकता के लिए व्यापक अभियान की आवश्यकता है। न्यायमूर्ति काटजू की टिप्पणी के बाद सरकार और संसद को यथाशीघ्र इस मुद्दे पर बड़ी क्रांतिकारी पहल करनी चाहिए।
Tuesday, May 12, 2009
पत्नी के खूनी की बीवी को गोली मारी
हसनपुर : पत्नी के हत्यारे से बदला लेने के लिए साथी की मदद से उसकी बीवी पर गोली चला दी। जख्मी महिला को जिला अस्पताल रेफर किया गया है। पुलिस ने छानबीन शुरू कर दी है। मामले की रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई है।
रजबपुर थाना क्षेत्र के गांव नरैना कला निवासी अमरवती पत्नी रोहताश बेटी मोनिका के साथ सैदनगली थाना क्षेत्र के गांव पन्सूख मिलक में बहन के पास मिलने आई थी। यहां से वह वापस गांव लौट रही थी। आरोप है कि हसनगढ़-घनसूरपुर के बीच नरैना कला निवासी कोमल सिंह व ओमिन्दर सिंह ने महिला को जान से मारने की नीयत से गाली मार दी।इसके बाद आरोपी फरार हो गए। राहगीरों के सहयोग से घायल को सैदनगली थाने ले जाया गया। पुलिस ने महिला को अस्पताल में भर्ती कराया। बाद में नाजुक हालत को देखते हुए उसको जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया। पुलिस ने मामले की छानबीन शुरू कर दी है। खबर लिखे जाने तक रिपोर्ट नहीं लिखी गई थी।इस मामले में घायल की बेटी ने बताया कि हमलावर की पत्नी की पिछले दिनों गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उस मामले में उसके पिता इस समय जेल में हैं। उसी रंजिश में उसकी मां पर हमला किया गया है।उधर हसनपुर कोतवाली पुलिस ने बावनखेड़ी गांव में घर में घुस पिता-पुत्र पर गोली चलाने वाले साजिद पुत्र शाहिद खां को बंदी बनाकर जेल भेजा है। आरोपी से तमंचा भी बरामद होना दर्शाया है।
दुष्कर्म मामले में डाक्टर का बयान अंतिम नहीं
मुंबई। बांबे हाईकोर्ट ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि दुष्कर्म मामले में डाक्टर का बयान अंतिम नहीं माना जा सकता और विरोधाभासी मेडिकल रिपोर्ट के बावजूद भी दुष्कर्म की पुष्टि की जा सकती है। इसके साथ ही कोर्ट ने अभियुक्त पर 50 हजार का जुर्माना लगाते हुए पांच साल की सश्रम कैद की सजा सुनाई। जुर्माने की रकम पीड़िता को दी जाएगी। कोर्ट ने यह फैसला 7 मई को दिया।1987 में हुए इस दुष्कर्म कांड के अभियुक्त सुरेश जाधव को सतारा की एक सत्र अदालत ने 1989 में बरी कर दिया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार जाधव ने कक्षा सात में पढ़ने वाली 11 वर्षीय किशोरी से दुष्कर्म किया था। जाधव को किशोरी के परिवार वाले अच्छी तरह जानते थे। घटना के दिन पीड़िता के बड़े भाई ने जाधव से अपनी साइकिल पर किशोरी को घर छोड़ने को कहा, लेकिन जाधव पीड़ित छात्रा को घर छोड़ने के बजाए अपने घर ले गया और उसके साथ दुष्कर्म किया। लेकिन सुनवाई अदालत ने पाया कि डाक्टर के सबूतों के अनुसार कौमार्य झिल्ली फटी नहीं थी और पीड़ित छात्रा के शरीर पर किसी प्रकार की चोट के निशान नहीं थे। इस आधार पर अदालत ने जाधव को बरी कर दिया जिसके बाद हाईकोर्ट में अपील दाखिल की गई।वर्ष 2007 में हाईकोर्ट की एक अन्य पीठ ने इस फैसले को पलटते हुए जाधव को दोषी करार दिया। जाधव ने इस फैसले को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी जिसने हाईकोर्ट को इस मामले में नए सिरे से सुनवाई करने का निर्देश दिया।
सात मई को दिए फैसले में मुख्य न्यायाधीश स्वतंत्र कुमार तथा एससी धर्माधिकारी की खंडपीठ ने एक बार फिर निचली अदालत के फैसले को पलट दिया और जाधव को दोषी ठहराया।हाईकोर्ट ने कहा कि डाक्टर ने कहा है कि किशोरी की कौमार्य झिल्ली पर कोई चोट नहीं पहुंची है। लेकिन डाक्टर ने अन्य जगह पर स्वीकार किया है कि कौमार्य झिल्ली के फटे बिना भी यौन हमला हो सकता है। पीठ ने कहा कि डाक्टर के बयान पर जरूरत से अधिक विश्वास किया गया लेकिन 'दुष्कर्म साबित करने के लिए डाक्टर का बयान अंतिम परीक्षण नहीं है।'पीठ ने कहा कि बाकी सभी के बयान अपराध को साबित करते हैं.. अन्य गवाहों ने पीड़िता के मामले की पूरी तरह पुष्टि की है।' अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि एक छोटी बच्ची जाधव को फंसाने के लिए क्यों झूठी कहानी गढ़ेगी। हालांकि अपराध के घटने को काफी वक्त बीत जाने के कारण मामले में कुछ रियायत बरतते हुए अदालत ने आरोपी को अधिकतम सात साल के बजाय पांच साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने जाधव पर 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। अदालत ने कहा कि यह राशि बतौर मुआवजा पीड़िता को दी जाएगी।
Tuesday, March 31, 2009
गोविंदा ने चुनाव न लड़ने की घोषणा
मुंबई में अपने घर पर पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि पार्टी के कुछ लोगों को मेरे साथ काम करने में दिक्कत है और उन्होंने समस्याएं खड़ी कीं थीं.उनका कहना था,'' मैंने सोनिया गांधी को बता दिया है कि मैं चुनाव लड़ने के बजाए चुनाव प्रचार करना पसंद करूंगा.''उन्होंने कहा कि विरोधियों ने मेरी छवि धूमिल करने की कोशिश की, इसके बावजूद सोनिया गांधी को मुझ पर भरोसा है.लोगों की पहुंच से दूर होने के आरोपों को ठुकराते हुए गोविंदा ने कहा,'' कुर्सी पर बैठने के बजाए आम जनता के लिए काम करने से मतलब होना चाहिए.''गोविंदा ने कहा कि उन्हें खलनायक के रूप में पेश किया गया जबकि सच्चाई कुछ और है.
Thursday, March 19, 2009
ढोल वाली माँ को सलाम
उसने नहीं बजाया था ढोल कभी अपने पिता के घर। अपने पिता की सबसे लाड़ली थी वह। पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटी। लेकिन पति के घर कदम रखते ही उसका वास्ता पड़ा जीवन के भयावह यथार्थ से। कठिनतम परिस्थितियों से उसे दो-चार होना पड़ा। दो जून की रोटी जुटाने और परिवार की गाड़ी को सही दिशा में ले जाने की सोच उसने टाँगा ढोल अपने कंधे पर। समय गुजरने के साथ उसे बजाना भी आ गया। और फिर हुआ सफर शुरू जीवन के तमाम झंझावातों से जूझते हुए पति के साथ कदमताल करने का। आर्थिक अभाव, रूढ़ियों में जकड़ा परिवार, बात-बात पर क्रोध करने वाला पति और शादी के छः साल तक कोई संतान न होने के कारण ताने कसने वाला तथाकथित समाज। सबकुछ सहती गई वो। इस उम्मीद में कि कभी तो उसे औलाद का सुख मिलेगा और वह समय भी आया जब उसके घर बेटा हुआ। वह भी कई मन्नातों और पूजा-अर्चना के बाद।
समय गुजरने के साथ उसके घर-आँगन में एक-एक कर तीन बेटियों की किलकारियाँ भी गूँजी। ढेरों सपने बुनते हुए और लगातार मेहनत करते हुए वह अपने बच्चों को पढ़ाती रही। शादी-ब्याह, मन्नात, तीज-त्योहार पर ढोल बजाते हुए वह चलती रही अपनी राह। इस बात की संतुष्टि उसे सदैव रही कि अभावों एवं दुःख के बादलों के बीच भी उसके बेटे-बेटियाँ अपनी पढ़ाई कर रहे हैं। कभी नमक-मिर्च के साथ अपना दिन काटती तो कभी मूसलधार बरसते पानी में खपरैल से बहती धारा के बीच एक कमरे में अपने बच्चों को समेटे वह ढोल वाली "माँ" तब बहुत खुश होती थी जब कोई उससे कहता कि "तुम्हारा बेटा पढ़ने में बहुत होशियार है।" अपने परिवार की समृद्धि और सुनहरे भविष्य की उम्मीदें अपने एकमात्र बेटे में ढूँढती थी वो। उसके बेटे ने भी दसवीं तक की शिक्षा लेने के बाद अपनी जिम्मेदारियों को समझा और अपना खर्चा खुद निकालकर परिवार को सहयोग करने लगा। जिम्मेदारी का अहसास तो उसे तभी हो गया था जब उसने होश संभाला था। त्याग की भावना भी उसमें अपनी माँ से ही आई। एक ठेठ देहाती गाँव के अत्यंत अल्पशिक्षित एवं सामाजिक रूप से पिछड़े परिवार के लिए निःसंदेह यह एक बड़ी बात थी कि वहाँ पढ़ाई के महत्व को समझा जाने लगा। इसके पीछे "ढोल वाली माँ" की दूरदृष्टि ही थी। वह आज एक ऐसे उच्च शिक्षित बेटे की माँ है, जिसके पास पद भी है और प्रतिष्ठा भी। उसकी तीनों बेटियाँ स्नातक स्तर तक शिक्षित हैं और अपनी घर-गृहस्थी तो संभाल ही रही हैं, साथ ही करियर भी। लेकिन ढोल वाली माँ अभी भी वैसी की वैसी ही है। अपने बच्चों के बार-बार मना करने के बावजूद यदा-कदा ढोल उसके कंधे पर दिख ही जाता है। जैसे ही वह कीमची मारती है उसकी थाप लोगों को एक संदेश दे जाती है- संदेश... अँधेरे से लड़ते रहने का...। बाधाओं को पार करके अनवरत चलते रहने का। जीवन में बिना कुछ किए जिन्हें सब कुछ मिल जाता है, वे उसका मोल नहीं जानते। पैतृक संपत्ति के बल पर ऊँचे ओहदे हासिल करने वाले क्या समझेंगे उस ढोल वाली माँ की सफलताओं को। उसकी उपलब्धियाँ किसी भी प्रबंधक अथवा अधिकारी से कमतर नहीं। वह ढोल वाली माँ आदर्श है कई माँओं की। ऐसी माँ को हजारों सलाम।
