Tuesday, March 31, 2009

गोविंदा ने चुनाव न लड़ने की घोषणा

फ़िल्म अभिनेता और मुंबई उत्तर से कांग्रेस के सांसद गोविंदा पार्टी का कहना कि लोक सभा चुनाव न लड़ने की अपनी इच्छा के बारे में उन्होंने पार्टी आलाकमान को बता दिया है.गोविंदा ने 2004 के चुनाव में पूर्व केंद्रीय मंत्री और भारतीय जनता पार्टी उम्मीदवार राम नाइक को हराया था।
मुंबई में अपने घर पर पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि पार्टी के कुछ लोगों को मेरे साथ काम करने में दिक्कत है और उन्होंने समस्याएं खड़ी कीं थीं.उनका कहना था,'' मैंने सोनिया गांधी को बता दिया है कि मैं चुनाव लड़ने के बजाए चुनाव प्रचार करना पसंद करूंगा.''उन्होंने कहा कि विरोधियों ने मेरी छवि धूमिल करने की कोशिश की, इसके बावजूद सोनिया गांधी को मुझ पर भरोसा है.लोगों की पहुंच से दूर होने के आरोपों को ठुकराते हुए गोविंदा ने कहा,'' कुर्सी पर बैठने के बजाए आम जनता के लिए काम करने से मतलब होना चाहिए.''गोविंदा ने कहा कि उन्हें खलनायक के रूप में पेश किया गया जबकि सच्चाई कुछ और है.

Thursday, March 19, 2009

ढोल वाली माँ को सलाम

ढ़ोल वाली माँ


मैंने देखा है उसे दस किलो का ढोल अपने कंधे पर टाँग बजाते हुए। हर तीज, त्योहार एवं विवाह आदि समारोह में वह दिख जाती है, शहर की गलियों को अपनी इच्छाशक्ति के कदमों से नापते हुए। तीस सालों से यह क्रम जारी है, लेकिन उसके चेहरे पर प्रसन्नाता एवं संतुष्टि के मिले-जुले भाव अब भी वैसे ही दिखाई देते हैं, जैसे पहले थे। गाँव में रहते हुए जातिगत भेदभाव का सामना उसे भी करना पड़ा, परंतु उसकी व्यवहार-कुशलता की हर कोई दाद देता है।
उसने नहीं बजाया था ढोल कभी अपने पिता के घर। अपने पिता की सबसे लाड़ली थी वह। पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटी। लेकिन पति के घर कदम रखते ही उसका वास्ता पड़ा जीवन के भयावह यथार्थ से। कठिनतम परिस्थितियों से उसे दो-चार होना पड़ा। दो जून की रोटी जुटाने और परिवार की गाड़ी को सही दिशा में ले जाने की सोच उसने टाँगा ढोल अपने कंधे पर। समय गुजरने के साथ उसे बजाना भी आ गया। और फिर हुआ सफर शुरू जीवन के तमाम झंझावातों से जूझते हुए पति के साथ कदमताल करने का। आर्थिक अभाव, रूढ़ियों में जकड़ा परिवार, बात-बात पर क्रोध करने वाला पति और शादी के छः साल तक कोई संतान न होने के कारण ताने कसने वाला तथाकथित समाज। सबकुछ सहती गई वो। इस उम्मीद में कि कभी तो उसे औलाद का सुख मिलेगा और वह समय भी आया जब उसके घर बेटा हुआ। वह भी कई मन्नातों और पूजा-अर्चना के बाद।
समय गुजरने के साथ उसके घर-आँगन में एक-एक कर तीन बेटियों की किलकारियाँ भी गूँजी। ढेरों सपने बुनते हुए और लगातार मेहनत करते हुए वह अपने बच्चों को पढ़ाती रही। शादी-ब्याह, मन्नात, तीज-त्योहार पर ढोल बजाते हुए वह चलती रही अपनी राह। इस बात की संतुष्टि उसे सदैव रही कि अभावों एवं दुःख के बादलों के बीच भी उसके बेटे-बेटियाँ अपनी पढ़ाई कर रहे हैं। कभी नमक-मिर्च के साथ अपना दिन काटती तो कभी मूसलधार बरसते पानी में खपरैल से बहती धारा के बीच एक कमरे में अपने बच्चों को समेटे वह ढोल वाली "माँ" तब बहुत खुश होती थी जब कोई उससे कहता कि "तुम्हारा बेटा पढ़ने में बहुत होशियार है।" अपने परिवार की समृद्धि और सुनहरे भविष्य की उम्मीदें अपने एकमात्र बेटे में ढूँढती थी वो। उसके बेटे ने भी दसवीं तक की शिक्षा लेने के बाद अपनी जिम्मेदारियों को समझा और अपना खर्चा खुद निकालकर परिवार को सहयोग करने लगा। जिम्मेदारी का अहसास तो उसे तभी हो गया था जब उसने होश संभाला था। त्याग की भावना भी उसमें अपनी माँ से ही आई। एक ठेठ देहाती गाँव के अत्यंत अल्पशिक्षित एवं सामाजिक रूप से पिछड़े परिवार के लिए निःसंदेह यह एक बड़ी बात थी कि वहाँ पढ़ाई के महत्व को समझा जाने लगा। इसके पीछे "ढोल वाली माँ" की दूरदृष्टि ही थी। वह आज एक ऐसे उच्च शिक्षित बेटे की माँ है, जिसके पास पद भी है और प्रतिष्ठा भी। उसकी तीनों बेटियाँ स्नातक स्तर तक शिक्षित हैं और अपनी घर-गृहस्थी तो संभाल ही रही हैं, साथ ही करियर भी। लेकिन ढोल वाली माँ अभी भी वैसी की वैसी ही है। अपने बच्चों के बार-बार मना करने के बावजूद यदा-कदा ढोल उसके कंधे पर दिख ही जाता है। जैसे ही वह कीमची मारती है उसकी थाप लोगों को एक संदेश दे जाती है- संदेश... अँधेरे से लड़ते रहने का...। बाधाओं को पार करके अनवरत चलते रहने का। जीवन में बिना कुछ किए जिन्हें सब कुछ मिल जाता है, वे उसका मोल नहीं जानते। पैतृक संपत्ति के बल पर ऊँचे ओहदे हासिल करने वाले क्या समझेंगे उस ढोल वाली माँ की सफलताओं को। उसकी उपलब्धियाँ किसी भी प्रबंधक अथवा अधिकारी से कमतर नहीं। वह ढोल वाली माँ आदर्श है कई माँओं की। ऐसी माँ को हजारों सलाम।

गरीबी के चलते बेचना पड़े गुर्दे

काहिरा की एक गरीब बस्ती के युवा दंपति को अपना सब कुछ बेचना पड़ा। इसके बाद भी जब उनकी मुफलिसी नहीं गई तो उन्होंने अपना एक-एक गुर्दा बेच दिया। चोरी-छिपे एक निजी अस्पताल में हुए ऑपरेशन के बाद एक व्यक्ति और उसकी पत्नी को आधी बेहोशी की हालत में टैक्सी में छोड़ दिया गया और गुर्दे के एवज में उनके कपड़ों में धनराशि रख दी गई। अब एक वर्ष बाद भी वे इतने गरीब हैं कि वे गुर्दा देने के बाद अपनी सेहत ठीक नहीं रख सके और अधिकतर समय बिस्तर पर ही गुजार देते हैं। 24 वर्षीय अब्दुल रहमान अब्दुल अजीज कहीं ज्यादा बुढ़ा नजर आ रहा है। उसने कहा अगर कोई मुझे खतरे के बारे में स्पष्ट कर देता तो मैं ऐसा नहीं करता। कई वर्षों से यह कहा जाता है कि मिस्र में महज दो हजार अमेरिकी डॉलर के लिए भी गुर्दे बेच दिए जाते हैं। दलाल लोगों की तलाश में रहते हैं। इस गैरकानूनी कारोबार के तहत कई विदेशी नागरिक गुर्दे हासिल करने मिस्र आते हैं।

Monday, March 16, 2009

गृह मंत्री बनने की तैयारी में अमर सिंह

नई दिल्ली.amar singh अमर सिंह गृह मंत्री बनने की तैयारी में हैं, जी हां बिल्कुल ठीक सुना आपने, लेकिन रियल लाइफ में नहीं बल्कि रील लाइफ में। यह तो सभी जानते हैं कि अमर सिंह कई फिल्मी हस्तियों के करीबी रहे हैं जिसके चलते उन्होंने भी एक्टिंग तो सीख ही ली है।दरअसल अमर सिंह को देव आनंद की फिल्म चार्जशीट में गृह मंत्री की भूमिका निभाने का प्रस्ताव मिला और उन्होंने इसे स्वीकार भी कर लिया है। पत्रकारों से चर्चा करते हुए अमर सिंह ने इस बात की पुष्टि की और यह भी बताया कि इस फिल्म की शूटिंग दिल्ली स्थित उनके निवास पर ही होगी।उन्होंने कहा कि जब मेरे पास फिल्म में गृह मंत्री का किरदार निभाने का प्रस्ताव आया तो मैं ठुकरा नहीं सका क्योंकि ये प्रस्ताव देव आनंद की ओर से आया था, जिनका मैं बहुत सम्मान करता हूँ। हालाँकि उन्होंने फिल्म के बारे में कुछ और नहीं बताया। अमर सिंह पहले भी कई फिल्मों में झलक दिखा चुके हैं लेकिन लेकिन किसी किरदार में नहीं, अमर सिंह के रूप में ही।समाजवादी पार्टी के महासचिव अमर सिंह फिल्म इंडस्ट्री की हस्तियों से नजदीकियों के के कारण पहले ही चर्चित हैं। फिल्मी पार्टियों और समारोहों में उन्हें अक्सर देखा जाता रहा है। अमिताभ बच्चन से उनके रिश्ते तो जगजाहिर हैं।

पाक में 'क्रांति की शुरुआत'

रविवार सुबह से ही पाकिस्तान की राजनीति में उस समय और गरमी बढ़ गई, जब ये ख़बर आई कि नवाज़ शरीफ़ को नज़रबंद कर दिया गया है.हालाँकि पाकिस्तान की सरकार ने ऐसी किसी भी बात से इनकार किया है.बाद में नवाज़ शरीफ़ मीडिया के सामने आए और पत्रकारों को बताया कि सरकार ने उन्हें ग़ैर क़ानूनी रूप से इस्लामाबाद जाने से रोकने की कोशिश की है.नवाज़ शरीफ़ की कथित नज़रबंदी की ख़बर फैलते ही पार्टी समर्थक सड़कों पर आ गए और कई जगह पुलिस के साथ उनकी झड़प हुई.

मांग:-पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के शासनकाल के दौरान बर्ख़ास्त जजों की बहाली की मांग को लेकर विरोध मार्च का आयोजन किया गया है.


इस्लामाबाद हमारी नियति है. हम इस्लामाबाद के लिए निकल पड़े हैं. आश्चर्यजनक रूप से लोगों का समर्थन मिल रहा है. पाकिस्तान के इतिहास का यह स्वर्ण काल है. ये क्रांति की दस्तक है
नवाज़ शरीफ़

कार्यक्रम ये है कि देश के कई हिस्सों से इस्लामाबाद पहुँचकर प्रदर्शनकारी सोमवार को संसद भवन के बाहर धरना देंगे.लेकिन सरकार इसे रोकने की हरसंभव कोशिश कर रही है. कई जगह प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई की गई है और कई नेताओं को गिरफ़्तार भी किया गया है.पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने नवाज़ शरीफ़ और उनके भाई शाहबाज़ शरीफ़ के किसी भी निर्वाचित पद पर काम करने से रोक लगा दी थी.उसके बाद नवाज़ शरीफ़ ने भी सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल लिया है और विरोध प्रदर्शन को समर्थन दे रहे हैं.लाहौर से इस्लामाबाद निकलते समय नवाज़ शरीफ़ ने कहा कि उन्हें इस्लामाबाद जाने से कोई नहीं रोक सकता.

'क्रांति की शुरुआत':-एक टीवी चैनल से बातचीत में उन्होंने कहा, "इस्लामाबाद हमारी नियति है. हम इस्लामाबाद के लिए निकल पड़े हैं. आश्चर्यजनक रूप से लोगों का समर्थन मिल रहा है. पाकिस्तान के इतिहास का यह स्वर्ण काल है. ये क्रांति की शुरुआत है."



लाहौर में जम कर हिंसा हुई है

अधिकारियों ने लाहौर से इस्लामाबाद जाने वाले सभी रास्तों को सील कर दिया है. लेकिन नवाज़ शरीफ़ की पार्टी के कार्यकर्ता अवरोधों को हटाने की कोशिश कर रहे हैं.लाहौर में कई जगह नवाज़ शरीफ़ समर्थकों और सुरक्षाकर्मियों के बीच झड़प हुई है.पुलिस ने उग्र भीड़ पर आँसू गैस के गोले छोड़े, तो लोगों ने पुलिस पर जम कर पथराव किया. कुछ लोगों को चोटें भी आई हैं.दूसरी ओर राजधानी इस्लामाबाद को भी छावनी में तब्दील कर दिया गया है. यहाँ आने-जाने वाले लोगों पर नज़र रखी जा रही है और बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया है.

Thursday, March 5, 2009

मासूम के बलात्कारी को दस वर्ष की कैद

अमरोहा(ज्योतिबाफूलेनगर):मंडी धनौरा में मासूम के साथ बलात्कार करने के दोषी युवक को अदालत ने दस वर्ष के कठोर कारावास व बीस हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई है।काबिलेगौर है कि डिडौली कोतवाली क्षेत्र के गांव पतेई खालसा का रहने वाला कमल सिंह पु्रत्र मवासी सैनी वर्ष 2000 में मंडी धनौरा के महादेव मुहल्ला निवासी चंद्रपाल सिंह के मकान में किराए पर रह रहा था। 19 अप्रैल 2000 की शाम मकान मालिक की चार वर्षीय मासूम बेटी को अकेला पाकर किराएदार उसे कमरे में ले गया तथा बलात्कार किया। इस दौरान पीड़िता की मां आ गई। चीख पुकार सुनकर आरोपी भाग निकला। बालिका के पिता की नामजद रिपोर्ट पर पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर अदालत के माध्यम से जेल भेज दिया। मौजूदा समय में भी आरोपी जेल में बंद है।उधर मामला विशेष सत्र न्यायाधीश सतेंद्र सिंह की अदालत में चलता रहा। सोमवार को न्यायाधीश श्री सिंह ने तमाम पहलुओं का अध्ययन किया तथा आरोप सही पाए। उन्होंने दोषी को दस वर्ष के कठोर कारावास व बीस हजार रुपए के जुर्माने की सजा सुनाई। श्री सिंह ने आदेश दिया कि जुर्माने की आधी रकम पीडि़त पक्ष को दी जाए।

पुलिस अभिरक्षा से कैदी फरार

अमरोहा(ज्योतिबाफूलेनगर): मंडी धनौरा से अदालत में पेशी पर लाते समय एक मुल्जिम यहां अतरासी तिराहे पर चार सिपाहियों को चकमा देकर चलते टेम्पो से कूदकर फरार हो गया।थाना मंडी धनौरा पुलिस ने गजरौला के निवासी बंटी उर्फ विक्की को 12 बोर के तमंचे, यहीं के कुलदीप को चाकू, धनौरा थाना क्षेत्र के गांव लालरी निवासी भोपत , गांव वसी रुस्तमपुर निवासी लाल सिंह को अवैध शराब के साथ गिरफ्तार कर संबंधित धाराओं में मुकदमा पंजीकृत किया था। बुधवार को पुलिस टेम्पो से चारों सीजेएम की अदालत में पेशी पर लेकर आ रही थीे। सभी मुल्जिम अलग-अलग हथकड़ी में बंधे थे। इनका रस्सा एक ही था। अपराह्न दो बजे टेम्पो नगर कोतवाली क्षेत्र में बिजनौर मार्ग पर अतरासी तिराहे के नजदीक पहुंचा, तभी मुल्जिम विक्की ने हथकड़ी से हाथ निकालकर चलते टेम्पो से छलांग लगा दी व कल्याणपुर मार्ग की दिशा में भाग खड़ा हुआ। एक सिपाही चंद्रपाल ने पकड़ने को दौड़ लगा दी। काफी पीछा करने पर भी हाथ नहीं आया व टै्रफिक की भीड़ में ओझल गया।

Wednesday, March 4, 2009

घायल खिलाड़ी भी लौटे, न्यूजीलैंड ने रद्द किया दौरा

कोलंबो/वेलिंगटन.srilankan players मंलवार को लाहौर में हुए हमले के बाद बुधवार तड़के श्रीलंका की टीम चार्टर्ड प्लेन से स्वदेश लौट आई। इस हमले के बाद न्यूजीलैंड की टीम ने भी पाकिस्तान का आगामी दौरा रद्द कर दिया है। नवंबर माह में न्यूजीलैंड को पाकिस्तान के दौरे पर जाना था, लेकिन मौजूदा घटना के बाद इसे रद्द कर दिया गया है।

न्यूजीलैंड के खिलाड़ी जैकब ओरम ने कहा कि इस हमले के बाद तो हमें भारत में होने वाले आईपीएल टूर्नामेंट के बारे में भी सोचना पड़ेगा। न्यूजीलैंड क्रिकेट के चीफ जस्टिन वॉन ने कहा है कि हमने अपना पाकिस्तान दौरा रद्द कर दिया है।mandisउन्होंने रेडियो न्यूजीलैंड से कहा कि पाकिस्तान जाने का हमारा अब कोई इरादा नहीं है। न्यूजीलैंड क्रिकेट के अधिकारी अप्रैल या जून में पीसीबी के अधिकारियों से मिलकर इन मैचों को किसी तीसरे देश में आयोजित करवाने के मुद्दे पर विचार करेंगे।इधर बुधवार सुबह कोलंबो एयरपोर्ट पर जैसे ही श्रीलंकाई खिलाड़ी पहुंचे वहां माहौल काफी गमगीन हो गया।खिलाड़ियों के लेने उनके परिवारजनों के अलावा खेल मंत्री और कुछ वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे। पत्नियों, बच्चों और परिवार वालों से मिलकर कई खिलाड़ी खुद को नहीं रोक पाए।

सभी भावुक नजर आए।samarweera समरवीरा खतरे से बाहर हैं लेकिन उनकी हालत गंभीर है इसलिए उन्हें स्ट्रेचर पर ही विशेष गाड़ी से बाहर लाया गया। एयरपोर्ट पर पहुंचे कप्तान माहेला जयवर्धने के चेहरे पर दहशत साफ देखी जा सकती थी।जयवर्धने ने कहा कि हम अभी तक नहीं समझ पा रहे हैं कि यह सब कैसे हुआ। सभी खिलाड़ी सही-सलामत घर लौट आए हैं, यही बहुत बड़ी बात है। इसमें ही हम सब खुश हैं। वहीं मामूली रूप से घायल मुथैया मुरलीधरन ने कहा कि यह कुछ काफी जल्दी और अचानक हुआ। ड्राइवर की होशियारी की वजह से ही आज हम जिंदा हैं।

jaywardhaneश्रीलंका एयरपोर्ट पर अपने घायल साथियों के साथ पहुचंने के बाद जयवर्धने अपने परिवार को देखकर इतने भावुक हो गए कि उनकी आंख से आंसू तक निकल पड़े। जयवर्धने ने कहा कि हम मौत को बेहद करीब से देखे हैं और भगवान ने ही हमें बचाया। जिस तरह से हमारी बस पर फायरिंग हो रही थी, उस वक्त हमने सोचा कि आज हमारा आखिरी दिन है लेकिन ड्राइवर की सूझ-बूझ से हम सभी खिलाड़ी थोड़ी बहुत चोट के साथ पूरी तरह से सुरक्षित हैं।पाकिस्तान में आतंकियों की खोजबीन जारी है। गौरतलब है कि इस हमले में पांच पुलिसकर्मी भी मारे गए थे। पुलिस ने लाहौर में श्रीलंका की क्रिकेट टीम पर मंगलवार को हमला करने वाले बंदूकधारियों की तलाश तेज कर दी है। इस हमले में श्रीलंकाई टीम की सुरक्षा में तैनात छह पुलिसकर्मियों की मौत हो गई। जबकि श्रीलंका के सात खिलाड़ी और सहायक कोच घायल हो गए थे।

क्रिकेट के भविष्य पर संकट

म्यूनिख ओलंपिक ग्राम में फलस्तीनी आतंकियों के हाथों 1972 में 11 इसराइली खिलाड़ियों की हत्या आधुनिक खेल इतिहास में हिंसा की सबसे जघन्य घटना है। लेकिन मंगलवार को लाहौर में श्रीलंकाई क्रिकेटरों पर हुआ हमला भी कम खौफनाक नहीं है। फिर चाहे इसमें हताहतों की संख्या कम है और किसी खिलाड़ी की मौत नहीं हुई है। इस हमले ने निकट भविष्य में किसी भी क्रिकेट टीम के पाक दौरे को असंभव बना दिया है।इससे खेल के भविष्य के लिए ही खतरा पैदा हो गया है। यदि कोई देश पाक जाने को राजी नहीं होगी तो इसकी संभावना भी नहीं होगी कि कोई देश पाकिस्तानी टीम की मेजबानी करेगा। टैस्ट क्रिकेट खेलने की हकदार टीमें सिर्फ दस हैं।इनमें से भी जिम्बाब्वे और बांग्लादेश की टीमें हाशिये पर पहुंच गई हैं। अब यदि पाकिस्तान अलग-थलग पड़ गया तो क्रिकेट की दुनिया नाटकीय रूप से सिकुड़ जाएगी।अप्रैल मध्य में होने वाले हाई प्रोफाइल इंडियन प्रीमियर लीग टूर्नामेंट पर भी इसका परोक्ष असर पड़ेगा। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने आम चुनाव के साथ होने के कारण आईपीएल के लिए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था मुहैया न करा सकने के संकेत दिए हैं।

टूर्नामेंट का कार्यक्रम नए सिरे से तय करना व्यवस्था के हिसाब से दु:स्वप्न ही होगा। स्टार खिलाड़ियों के अभाव से आयोजन का रंग भी फीका पड़ सकता है। कई ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी पहले ही जा चुके हैं और अब शारीरिक चोट या मानसिक आघात के कारण श्रीलंकाई खिलाड़ियों की उपलब्धता भी संदेह में है।सबसे गंभीर मामला 2011 के विश्व कप का है। इसे भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश संयुक्त रूप से आयोजित करने वाले थे। अब चूंकि क्रिकेट जगत के खिलाड़ी व सरकारें पाकिस्तान में मैचों के खिलाफ होंगे इसलिए विश्व कप के पूरे कार्यक्रम को फिर तय करना होगा।भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के लिए यह स्थिति इसलिए भी चीढ़ पैदा करने वाली होगी, क्योंकि खेल पर अपना दबदबा स्थापित करने के लिए यह पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के वोटों पर बहुत निर्भर हो गया था। लेकिन मौजूदा संदर्भ में हो सकता है कि इस मामले में बीसीसीआई के सामने कोई विकल्प न हो।कॉमन सेंस छोड़ भी दें तो जन भावना और खुफिया रिपोर्टे भारत सरकार को कोई रुख लेने पर मजबूर कर देंगे। जैसा पिछले साल दौरा रद्द करते समय हुआ था। पिछले कुछ समय से राजनीतिक पर्यवेक्षक पाकिस्तान को ऐसे अस्थिर देश के रूप में देख रहे हैं, जो आंतरिक बिखराव का इंतजार कर रहा है। वहां क्रिकेट दौरे जैसे लोकप्रिय आयोजन में हमले का खतरा हमेशा से था।अब यह बहस का विषय है कि क्या यह हमला मूलरूप से भारतीय टीम पर किया जाने वाला था, जो पाकिस्तान दौरे पर जाने वाली थी। हालांकि उस स्थिति में सुरक्षा व्यवस्था बिलकुल ही अलग होती। यह विडंबना ही है कि 14 माह में पाकिस्तान जाने वाली पहली टीम बनकर श्रीलंका ने पाकिस्तानी क्रिकेट की मदद करने की कोशिश की और उसे ही निशाना बना दिया गया। हालांकि इससे मौजूदा आतंकवाद के तर्कहीन चरित्र का ही खुलासा होता है, जिसमें निदरेष लोगों को निशाना बनाया जाता है, जैसा मुंबई में पिछले साल नवंबर में हुआ था।